कल शाम हम मिले थे जहां ,
गुलमोहर के पास .
वही गुलमोहर जिसके तले ,
अक्सर मिला करते थे हम .
मैं अब फिर से खड़ा हूँ ,
उसी दरख़्त के करीब ही ,
जहाँ तुने उठा के
अपनी पलकें ,
इस तरह छुड़ाया
कल हाथ अपना ,
जैसे ‘पेन ’ झटक देते हैं
चलते चलते रुक जाए अगर

