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Sunday, February 1, 2026

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गरम-ए फ़रयाद रखा शकल-ए निहाली ने मुझे तब अमां हिजर में दी बरद-ए लियाली ने मुझे निसयह-ओ-नक़द-ए दो-आलम की हक़ीक़त म’लूम ले लिया मुझ से मिरी हिममत-ए-आली ने मुझे कसरत-आराई-ए वहदत है परसतारी-ए-वहम कर दिया काफ़िर इन असनाम-ए ख़याली ने मुझे हवस-ए-गुल के तसववुर में भी खटका न रहा अजब आराम दिया बे-पर-ओ-बाली ने मुझे — ज़िंदगी में भी रहा ज़ौक़-ए-फ़ना का मारा नशशह बख़शा ग़ज़ब उस साग़र-ए ख़ाली ने मुझे बसकि थी फ़सल-ए ख़िज़ान-ए-चमनिसतान-ए-सुख़न रनग-ए शुहरत न दिया ताज़ह-ख़याली ने मुझे जलवा-ए-ख़वुर से फ़ना होती है शबनम ग़ालिब खो दिया सतवत-ए असमा-ए-जलाली ने मुझे

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गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज
क़ुमरी का तौक़ हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज

आता है एक पारा-ए-दिल हर फ़ुग़ाँ के साथ
तार-ए-नफ़स कमंद-ए-शिकार-ए-असर है आज

ऐ आफ़ियत किनारा कर ऐ इंतिज़ाम चल
सैलाब-ए-गिर्या दर पे दीवार-ओ-दर है आज

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