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Wednesday, March 18, 2026

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गिरे ताड़ से

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गिरे ताड़ से
मगर बीच में ही
खजूर पर हम अँटके।
घर की झोल लगी दीवारों पर हैं
चमगादड़ लटके
खूस गए हैं काठ
धरन, ओलती, दरवाज़े,चौखट के
और न जीवित रहे
याद में गीत
पनघट के।
साँप सूंघ जाने के कारण हम लगते
माहुर-माते
उखड़ रही साँसों से
कैसे आँखों की उलटन जातें
नागफनी के जंगल में
उम्मीदों के
बादुर भटके।
पूरी नींद न हम सो पाते
अब तक
मिले दिलासे से
जब तक सोने बदले
गए यहाँ हैं पीतल-काँसे से
पानी कहाँ रखे हम
पेंदी तक हैं
चिसक गए मटके।

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