25.1 C
Delhi
Thursday, March 19, 2026

Buy now

Ads

रंग

- Advertisement -

चढ़ते-उतरते हैं रंग
रंग उतरते-चढ़ते हैं
कितने ही रंग कर जाते हैं रंगीन
जीवन मटमैला

अदृश्य सीढ़ी हैं रंग
आने-जाने वाले दृश्य के बाहर
दृश्य का सिंहावलोकन विचार

आकाश की टपकती छत से
कितने रंग बिखरे हैं
कितने ही बिखरने को हैं

जिन हाथों में ब्रश हैं
आधे-अधूरे चित्र चित्रित जिनमें
वे कैनवॉस छिन गए

रंगों से खेलते चले आ रहे हैं वर्षों से
फाग अब फ़ाल्गुनी उत्सव भर नहीं है
रंगों टोलियाँ
काँपते-छूजते
अचानक में
आवाजाही करती है

देश का रंग
उतर रहा है लगातार बेहद शान्त।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
3,912FollowersFollow
14,700SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles