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Friday, March 20, 2026

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‘दयादासि’ हरि नाम लै, या जग में यह सार

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‘दयादासि’ हरि नाम लै, या जग में यह सार।
हरि भजते हरि ही भये, पायो भेद अपार॥
सोवत जागत हरि भजो, हरि हिरदै न बिसार।
डोरा गहि हरि नाम की, ‘दया’ न टूटै तार।
नारायन नर देह में, पैयत हैं ततकाल।
सतसंगति हरि भजन सूँ, काढ़ो तृस्ना व्याल॥
दया नाव हरि नाम को, सतगुरु खेवन हार।
साधू जन के संग मिलि, तिरत न लागै वार॥

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