ऐ ‘सबा’ जज़्ब पे जिस दम दिल-ए-ना-शाद आया
अपने आग़ोश में उड़ कर वो परी-ज़ाद आया
चश्म-ए-मूसा हमा-तन बन या मैं हैरत से
देखा इक बुत का वो आलम के ख़ुदा याद आया
आशिक़ों से न रहा कोई ज़माना ख़ाली
कभी वामिक़ कभी मजनूँ कभी फरहाद आया
दिल में इक दर्द उठा आँखों में आँसू भर आए
बैठे बैठे हमें क्या जानिए क्या याद आया
बैत-ए-हस्ती के ‘सबा’ हो गए मआनी रौशन
ख़्वाजा आतिश सा ज़माने में जो उस्ताद आया

