रेल कोच के शयनयान में
वातायन के निकट सीट पर,
मै बैठा यों ही देख रहा था
परिमंडल के दृश्य मनोहर।
वर्षा ऋतु चरमोत्कर्ष पर
धारासार बरसता जलधर,
बागों खेतों में सुदूर तक
जल से पूरित धरती अंचल।
रूपक सम नीर सतह ज्योतित
घनघोर घटा छाई नभ में,
मेंड़ों का शिखर झलकता था

