यह मेरा
अपमानित, तिरस्कृत शव…
शव भी कहाँ-
जली हडडियों की केस प्रापर्टी,
मुर्दाघर में अधिक-अधिक मुर्दा होती…
चिकित्सा विज्ञान के
शीर्ष पुत्रों की अनुशोधक कैंचियों से बिंधी,
विधि-विधान के जामाताओं का
सन्निपात झेलती…
ढोती
शोध पर शोध पर शोध-
यह तिरस्कृत देह…
सामाजिकों की दुनिया से
जबरन बहिष्कृत
अख़बारनवीसी के पांडव दरबार में नग्न पड़ी
यह कार्बन काया-
मुर्दाघर में अधिक-अधिक मुर्दा होती…
भाषा के मदारियों की डुगडुगी सुनती…
कट-कट
जल-जल
फुँक-फुँक कर भी
पहुँच नहीं पाती पृथ्वी की गोद तक…
न बची मैं
न देह
न शव…
भूमंडलीकरण की रासलीला के बीच
लावारिस मैं
अधिक-अधिक मुर्दा होती…
झेलती
पोस्ट-पोस्ट पोस्टमार्टम
उत्तर कोई नहीं
न आधुनिक, न उत्तर आधुनिक
न प्राचीन…
क्या
मुर्दों के किसी प्रश्न का
कोई उत्तर नहीं होता?

