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Wednesday, May 6, 2026

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गंगा-4 (कपड़े)

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सभी ने कपड़े उतार दिए हैं
सभी नदी में डुबकी लगाएँगे
सभी पाप की गठरी ढो कर लाए हैं
सभी अपनी गठरी यहीं छोड़ जाएँगे

बस इतना ही :
बहती नदी रुकती नहीं है
बहती नदी थकती नहीं है
बहती नदी पूछती नहीं है
कहाँ से आए, क्या लाए, क्यों लाए और छोड़े किसके लिए जाते हो

नदी ने सबको कपड़े पहना दिए हैं
पानी की मटमैली चादर के नीचे
न आदमी है, न पाप, न पुण्य, न हैसियत
सिर्फ़ नदी है
जो सबके भीतर बह रही है.

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