गर्मी के दिनों में
जंगल के बीचों बीच
सुनसान सड़क पर
एक विशाल पेड़ के पास ठहर कर
सुना
ज़ोरों से गूँजते
झीने संगीत को
मैंने मुग्ध भाव से कहा —
पेड़ पर बैठे झींगुरों का कोरस है यह
पत्नी बोली —
हरेक पेड़ की अपनी अलग आवाज़ होती है
चौदह बरस की बेटी ने कहा —
ऐसी कहीं कोई आवाज़ नहीं होती
मैं मुस्कुराया
कि चौदह की उमर में
अभी बेटी के कानों में
अनगिनत दूसरी आवाज़ें
गूँजती हैं
अभी जंगल की आवाज़
सुनने के लिए ज़रूरी
अवकाश नहीं है
उसके भीतर ।

