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Thursday, May 7, 2026

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वह नदी में नहा रही है

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वह नदी में नहा रही है
नदी धूप में
और धूप उसके जवान अँगों की मुस्‍कान मे
चमक रही है।
मेरे सामने
एक परिचित ख़ुशबू
कविता की भरी देह में खड़ी है
धरती यहाँ बिल्‍कुल अलक्षित है —
अन्तरिक्ष की सुगबुगाहट में
उसकी आहट सुनी जा सकती है ।

आसमान का नीला विस्‍तार
और आत्‍मीय हो गया है ।
शब्‍द
अर्थ में ढलने लगे हैं ।
और नदी
उसकी आँखों में अपना रूप देख रही है ।

आसमान के भास्‍वर स्‍वर उसके कानों का छूते हैं,
और वह गुनगुना उठती है ।
उसके अन्दर का गीत
[एक नन्‍हा पौधा]
सूरज की ओर बाँहे उठाए लगातार बढता जा रहा है ।

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