यहाँ से वहाँ तक दौड़ती रहती है।
कभी-कभी
जब बहुत घना हो जाता है अंधेरा,
लगता है,/ नहीं है–
पेड़-पौधे,/ पर्वत और झरने,
झीलें, नदियाँ–
ग़म में घुलते हुए कुनबे
और घोंसले / ख़ुशियों से कुलबुलाते–
सभी
नीली नींद में डूबे रहते हैं अपनी
मगर तब भी
पर्त-पर-पर्त पड़े अंधेरे की
छाती छेदती रहती है–
अपना पूरे वजूद लिए होती है रौशनी–
रौशनी अंधेरे का विलोम नहीं होती।

