रंग बदला, रूप बदला, रुख़ बदलना आ गया
हम को अपने को अय दोस्त छलना आ गया।
अब तो साज़िश नस्ल के बारे में भी होने लगी
उनको अपनी वल्दियत को भी बदलना आ गया।
धार पर तलवार की झूली है ऐसे ज़िन्दगी
भाप बन कर उड़ सकूँ इतना उबलना आ गया।
सभ्यता, शालीनता, तहज़ीब को, इखलास को
बर्फ की मानिंद रिस रिस कर पिघलना आ गया।
ये ज़माना चाहता है जानना ‘विश्वास’ से।
किस तरह उसको हवा के साथ चलना आ गया।

