28.1 C
Delhi
Friday, May 8, 2026

Buy now

Ads

रंग बदला, रूप बदला, रुख़ बदलना आ गया

- Advertisement -

रंग बदला, रूप बदला, रुख़ बदलना आ गया
हम को अपने को अय दोस्त छलना आ गया।

अब तो साज़िश नस्ल के बारे में भी होने लगी
उनको अपनी वल्दियत को भी बदलना आ गया।

धार पर तलवार की झूली है ऐसे ज़िन्दगी
भाप बन कर उड़ सकूँ इतना उबलना आ गया।

सभ्यता, शालीनता, तहज़ीब को, इखलास को
बर्फ की मानिंद रिस रिस कर पिघलना आ गया।

ये ज़माना चाहता है जानना ‘विश्वास’ से।
किस तरह उसको हवा के साथ चलना आ गया।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
3,912FollowersFollow
14,700SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles