असफलता के मौन क्षणों में, पथ पर हाथ मलेंगे
हम अपने टूटे पैरों से सारी उम्र चलेंगे
ढलते सूरज-सा शरीर है
रग-रग में उठ रही पीर है
रोगी जैसा कर्मवीर है
हम क्षय की सुलगी भट्टी में, सारी उम्र जलेंगे
यहाँ कहाँ रसवन्त कूल हैं,
जीवन के बहुवर्ण फूल हैं,
पग-पग पर चुभ रहे शूल हैं
हम बबूल के कण्टक-वन में सारी उम्र पलेंगे
दिन कैसे उतरे अवनी पर
चढ़ा मैल नृप की करनी पर
फला स्वार्थ टहनी-टहनी पर
हमें अन्धेरे में ठग-ठाकुर सारी उम्र छलेंगे

