जब भी मिरा ख़ालिक मुझे ईजाद करेगा
हर तरह से मजमुआ-ए-इज़्दाद करेगा
मैं लौट के फिर उस की ही जानिब न चला आऊँ
वो सोच समझ कर मुझे आज़ाद करेगा
हम को तो ये ख़ुश-फ़हमी नहीं हैं कि ज़माना
जब हम नहीं होंगे तो हमें याद करेगा
अब भी मुझे है उस चाँद-बदन से
इक रात वो मेरे लिए बर्बाद करेगा

