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Sunday, April 26, 2026

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देखा कभू न उस दिल-ए-नाशाद की तरफ

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देखा कभू न उस दिल-ए-नाशाद की तरफ
करता रहा तू अपनी ही बे-दाद की तरफ

जिस गुल ने सुन के नाला-ए-बुलबुल उड़ा दिया
रखता है गोश कब मेरी फरियाद की तरफ

मूँद ऐ पर-ए-शिकस्ता न चाक-ए-कफस के हम
टुक याँ को देख लेते हैं सय्याद की तरफ

कहते हैं गिर्या ख़ाना-ए-दिल कर चुका ख़राब
आता है चश्म अब तेरी बुनियाद की तरफ

लीजो ख़बर मेरे भी दिल-ए-ज़ार की नसीम
जावे अगर तू इस सितम-आबाद की तरफ

‘काएम’ तू इस गज़ल को यूँ ही सरसरी ही कह
होना पड़ेगा हज़रत-ए-उस्ताद की तरफ

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