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Friday, April 24, 2026

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नैहर आए

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घूँघट में लिपटे तुम्हारे रोगी चेहरे के पास
लालटेन का शीशा धुअँठता जाता है
साँझ बहुत तेज़ी से बीतती है गाँव में ।

भाई से पूछती हो — भोजन परसूँ ?
वह हाथ-पाँव धोकर बैठ जाता है पीढ़े पर
–छिपकली की परछाईं पड़ती है फूल के थाल में ।

आँगन में खाट पर लेटे-लेटे
बरसों पुराने सपने फिर-फिर देखती हो
–यह भी झूठ !
महीनों हो गए नैहर आए ।

चूहे धान की बालें खींच ले गए हैं भीत पर
बिल्ली रात भर खपरैल पर टहलती रहती है
माँ कुछ पूछती है, फिर रूआँसी हो जाया करती है ।

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