बिपति बिदारीबे की, कुमति निबारबे की,
सुरति सँभारबे की, जाकी परी बान है।
सुजस दिबाइबे की, सु-रस पिबाइबे की,
सरस बनाइबे की अदभुत आन है।
भाबना बढ़ाइबे की, भाउ बिकसाइबे की,
सुख सरसाइबे की रुचि-सुचि सान है।
‘प्रीतम’ सुजान जान ऐसी बुद्धि दायनी कों,
बन्दों बार-बार जाकी महिमा महान है।।
तो सों ही सरंगे मन मोद के मनोरथ औ,
सुलभ समृद्धि के जु सुगम सुरुचि काज।
बैभव बिपुल भव भोग के सुभावन सों,
प्रचुर प्रभाबन सों पूरित रहंगे साज।
तेरे ही प्रसाद दुख दारिद दहंगे अब,
सुखद सजैगी तब ‘प्रीतम’ सु कवि लाज।
चित्त के अनन्द छन्द बन्दन करन हेतु,
ए री जगदम्ब मेरे रसना पै बैठ आज।।
तेरे ही बिहरिबे कों अजिर बनायौ हिय,
भाबना के भौनन में सुभग सजाये साज।
कल्पना कुसुम कमनीय बिकसित भए,
भाग भौर भ्रमन हूँ करें जहाँ गंध काज।
‘प्रीतम’ सुकवि काव्य कौमुदी खिली है बेलि,
मेल की थली है जित तेरौ ही रहैगौ राज।
साँच जिय जान, आन छन्दन प्रबन्ध हेतु-
ए री जगदम्ब मेरे रसना पै बैठ आज।।
सरस बती हौ मातु, सरस स्रुतीन गायौ,
सरस दै सुधी निधी राखौ मति मन्द ना।
सरस सु ग्रन्थ बीना धार हार धौरौ सुभ्र,
हँसन बसन सुभ्र जा के सम चन्द ना।
फन्द ना रहें हैं कछू, ओपै जो तिहारी दया,
मो पै करौ त्यों ही, जो पै रहें दुख द्वन्द ना।
‘प्रीतम’ कबिन्द बृन्द छन्दन सराहिबे कों,
बानी मम करै बीना पानी की सु बन्दना।।
भारत की भब्यता कों, भावन की स्वच्छता कों,
अच्छ रच्छ लच्छन प्रतच्छ ह्वै प्रसारती।
राष्ट्र हित एकता कों, बुद्धि की बिबेकता कों,
जग-जन जीवन में नेकता उभारती।
नित नव गहन में नेह की निकुंज रचि,
बनि अलि मधुरिम गुनन गुंजारती।
‘प्रीतम’ निधि आरती कों बानी ते उतारती, औ,
गावत जस भारती, जै-जै रस भारती।।

